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Sunday, 8 March 2015

Industrial Policy

औधोगिक नीति ( Industrial Policy )


भारत मे औधोगिक नीति सबसे पहले 1601 में औधोगिक नीति बनी।

     1. स्वतंत्रता पूर्व की औधोगिक नीति
     2. औधोगिक नीति, 1948
     3. औधोगिक नीति, 1956
     4. औधोगिक नीति, 1977
     5. औधोगिक नीति, 1980
     6. वर्तमान औधोगिक नीतिनवीन औधोगिक नीति, 1991

1. स्वतंत्रता से पूर्व की औधोगिक नीति- भारत मे ब्रिटेन  ने औधोगिक पतन एवं आर्थिक शोषण की नीति को प्रारम्भ किया। अठाहरवीं शताब्दी के अंत तक परम्परागत अधोगो को एक-एक करके खत्म कर दिया गया। भारत से कच्चा माल निर्यात किया जाने लगाा तथा तैयार माल भारत मे आयात किया जाने लगा। परिणामस्वरूप भारतीय बाजार विदेशी माल से पाट दिये गये। 1943 मे भारत मे नियोजन एवं विकास विभाग कि स्थापना हुर्इ एवं 1945 मे औधोगिक नीति क घोषण की गयी।

2. औधोगिक नीति, 1948-

    1. उधोगो का वर्गीकरण -
प्रथम श्रेणी - अस्त्र-शस्त्र एंव युद्ध सामाग्री, परमाणु शकित।
द्वितिय श्रेणी-लोहा- इस्पात, कोयला, वायूयान, खनिज तेल, टेलीफोन जलयान
तीसरी श्रेणी-राष्ट्रीय महत्व के 18 उधोगो को समिमलित किया गया।उन पर सरकार का नियंत्रण एवं विनियमन आवश्यक समझा गया।
चोथी श्रेणी- शेष उधोग।
    2. लघु एवं कुटीर उधोग- लघु उधोग-पच्चीस लाख, एक करोड़ का विनियोग वाले उधोग कुटीर उधोग कहलाते है। मघ्यम उधोग एक करोड़ से पांच करोड़ तक, बडे़ उधोग पांच करोड़ से ज्यादा विनियोग वाले होते है। कुटीर उधोग में एक ही परिवार के लोग काम करते है। मषीनीकरण नही होता है। इन उधोगो के विकास के लिये कच्चा माल, र्इधंन, तकनीकी ज्ञान, पूंजी आधी रियायती दरो पर उपलब्ध करवायी जायेगी।

3. विदेशी पूंजी के प्रति दृषिटकोण- इस औधोगिक नीति प्रस्ताव मे सरकार ने यह स्पष्ट किया कि विदेशी पंूजी के आवश्यकता तो है लेकिन उस पर नियंत्रण भारत का होना चाहिये। सरकार नये धंधो का स्थापित करेगी, यातायात की सुविधाओ का प्रसार आर्थिक विषमतायें दूर हो 1948-1956

औधोगिक नीति, 1956

    1. उधोगो का वर्गीकरण- प्रथम श्रेणी - ऐसे 17 उधोगों को शामिल किया जिनके विकास का पूर्ण दायित्व सरकार का होगा। द्वितिय श्रेणी - ऐसे 12 उधोग जिनमें राज्य का अधिकार बढ़ता जायेगा और जिनमे सामान्यत: राज्य नये उधोगो की स्थापना करेगा। तृतीय श्रेणी- शेष सभी
    2. ग्रामीण और लघु उधोगो को प्रोत्साहन
    3. प्रादेशिक विषमताओं मे कमी -
    4. श्रम की सुविधाओं

    बेरोजगारी में वृद्धि, ग्राम तथा शहर मे असमानता, बड़े नगरों से दूर औधोगिक कार्यक्रम 1956-1977

4. औधोगिक नीति,1977

    1. लघु एंव छोटे पैमाने के उधोगो का विकास-
         -कुटीर तथा घरेलू उधोग
         -अति लघु उधोग (एक लाख से पचास हजार आबादी )
         -लघु उधोग (दस लाख)
    2. बड़े पैमाने पर उधोग 3. बड़े औधोगिक घराने के प्रति दृषिटकोण  4. तकनीकी     आत्मनिर्भरता  5. रूग्ण औधोगिक इकाइयां  6. सरकारी विदेषी सहायता।

5. औधोगिक नीति,1980

     1. सार्वजनिक क्षेत्र मे सुधार
     2. निजी क्षेत्र का विकास
     3. लघु उधोगो का विकास
     4. ग्रामीण उधोगो का विकास
     5. क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना
     6. मधुर औधोगिक सम्बन्ध
     7. निर्यात प्रधान उधोगो को प्रोत्साहन
     8. औधौगिक रूग्णता

6. वर्तमान औधोगिक नीतिनवीन औधोगिक नीति, 24 जुलार्इ 1991
    श्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व मे बनी कांग्रेस सरकार ने इसे बनायालागू किया।
उददेष्य:-
    1. देश का औधोगिक विकास के लिये मजबूत आधार 2. प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में वृद्धि करना। 3. अनावश्यक नियंत्रणो से मुक्त करना 4.उदारीकरण चालू करना। 5.प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग पर लगे प्रतिबंन्धो को हटाना। 6.आधुनिक प्रौधोगिकी को प्रोत्साहित करना। 7.देश मे पूंजी बाजार का विकास करना। 8.देश मे नीजी क्षेत्र उधोगो की सिथति को सुधारना। 9.उत्पादकता एवं लाभकारी रोजगार का विकास करना। 10.देश मे उपलब्ध संसाधनो का कुशलतम उपयोग करना। 11.देश को औधोगिक निष्पादन मे सुधार करना।

औधोगिक नीति की विशेषतायें-

    सार्वजनिक क्षेत्र के लिये आरक्षित उधोग, औधोगिक लार्इसेंस, विदेेशी विनियोग-20 प्रतिशत एफ एम रेडियों प्रसारण में। 49 प्रतिशत विमान सेवाकेबल नेटवर्क में और विदेशी प्रौधोगिकी। जुआ, चरस, लाटरी, परमाणु उर्जा, खुदरा बिक्री में एफ डी आर्इ नही आ सकती है।

सार्वजनिक क्षेत्र संबंधी नीति (Public Sector Policy)
    1.इस क्षेत्र में विनियोग की समीक्षा 2.बीमार उधोगो को पुन: स्थापित करना 3.सार्वजनिक क्षेत्र मे सरकारी हिस्सा  4.पूंजी के एक भाग को पारस्परिक निधियो, वितीय संस्थानो एवं सामान्य जनता को बेचा जा सकेगा।

एकाधिकार एंव प्रतिबंधात्मक व्यापार अधिनियम
    श्रम संबध, लघु उधोग
1. रक्षा  2. रेलवे  3. न्यूकिलयर  4. न्यूकिलयर पावर बनाने के लिये जिस आवष्यक कच्ची सामग्री की जरूरत होती है भारत में अधिक मात्रा में उपलब्ध है राजस्थान में सीकर उदयपुर के आसपास इसकी खान है।

राजकोषीय नीति
    सरकार के कर एंव गैर कर राजस्व मे वृद्धि, लोकहित मे सार्वजनिक वित का व्यय तथा कार्य करना और सार्वजनिक ऋणो का प्रबन्ध किया जाता है, उसे राजकोषीय नीति कहते है।
राजकोषीय नीति का अर्थ सरकार की ऐसी नीति से है जिसेके अन्तर्गत सरकार की आय-व्यय तथा ऋणो से सम्बनिधत नीतियों एंव व्यवहारो को समिमलित किया जाता है।

राजकोषीय नीति के उददेश्य:-

     1. विकास के साधनो केा गतिशील करना। 
     2. पूंजी निर्माण को बढ़ावा देना। 
     3. निवेष प्रोत्साहन ।
     4.(To counter act Inflation and Deflation) स्फीति एंव सकुंचन का प्रतिकार - सामान्यत: अल्प विकसित देषाें में स्फीतिकारक दबाव अधिक पाये जाते है। जबकि सकुंचन विकसित देषो मे होता है। मुद्रा स्फीति के अन्दर कीमत बढ़ जाती है खरीदने की क्षमता कम हो जाती है तब हमारी असली आयइनकम घट जाती है। संकुचन मे कीमत घट जाती है खरीदने की क्षमता बढ़ जाती है। वास्तविक आय बढ़ जाती है। 
     5. भुगतान सन्तुलन के असंन्तुलन को कम करना जिसके अन्तर्गत देश मे आया हुआ धन और देश से गये हुये धन का सुतुलन रखा जाता है। 
     6. राष्ट्रीय आय मे वृद्धि।
     7. रोजगार को बढ़ावा देना। 
     8. आय व धन वितरण को विषमता को कम करना।
     9. निर्धनता में कमी।

राजकोषीय नीति के उपकरण तरीके एवं उपाय-
राजकोषीय उपकरण -
1. करारोपण-आयकर, सम्पदाकर 18 प्रतिषत भाग है। सरकार को सीधा प्राप्त होता है तथा 82 प्रतिषत अप्रत्यक्ष कर का हिस्सा सरकार को प्राप्त होता है। 2. सार्वजनिक व्यय-Public exp 3. सार्वजनिक ऋण Public
Debt 4. घाटे की अर्थवयवस्था- Deficit Economy

भारतीय राजकोषीय नीति -

उददेश्य :-
    1. वितीय संसाधनो का संग्रह एवं गतिषीलता।
    2. बचत की प्रोत्साहन।
    3. मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण।
    4. सामाजिक न्याय।
1. राजस्व घाटा त्र राजस्व व्यय - राजस्व प्रापितयां।
2. राजकोषीय घाटा त्र कुल व्यय - (राजस्व प्रापितयां, ऋणो की वसूली अन्य प्रापितयां)
    Fiscal Deficit = Total exp. - (Revenue receipt + Loan Recovery +Other receipt)
3. प्राथमिक घाटा त्र राजकोषीय घाटा - ब्याज अदायगी

दीर्घकालीन राजकोष नीति -

    1985-86 के केन्द्रीय बजट भाषण मे तत्कालीन वितमंंत्री श्री विश्वनाथ प्रतापसिह ने यह कहा था कि सरकार एक दीर्घकालीन राजकोषीय नीति की घोषण करेगी जो अगले 5 वर्षो 1990-95 तक के लिये होगी।

विशेषतायें :-

  • प्रत्यक्ष करो का सरलीकरण करना। 
  • बचत को प्रोत्साहन करने हेतु नवीन राष्ट्रीय जमा योजना लागू करना। 
  • ह्रास छूट का सरलीकरण करके उसी 2 या 3 दरो मे रखना। 
  • उपहार करों को बनाये रखना।
    1 अप्रेल 1987 से विनियोग छुट को समाप्त करना। 
  • करों की चोरी करने वालो के खिलाफ कठोर कदम उठाना। 
  • प्रशुल्क नियंत्रण लगाकर आयात को नियंत्रित करना। 
  • छोटे स्तर के क्षेत्रो को उत्पादन कर के छूट दिया जाना। जब मुद्रा स्फीति धीरे धीरे बढ़ती है तो इसे क्पेपदसिंजपवद कहते है। सरकार कीमतें धीरे-2 घटाती है तो इसे Reinflation कहते है।   



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