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Sunday, 8 March 2015

Role and Problems of Public Sector in India

भारत मे सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका एवं इसकी समस्यायें

( Role and Problems of Public Sector in India )

                         संकुचित अर्थ मे सार्वजनिक क्षेत्र का अर्थ ऐसे क्षेत्रो से है जिनका स्वामित्व या प्रबन्ध संचालन एवं नियन्त्रण अथवा दोनो सरकार के अधीन हो, चाहे केन्द्रीय या राज्य सरकार अथवा दोनो हो। किन्तु विस्तृत अर्थ सार्वजनिक क्षेत्रों का अभिप्राय उन व्यावसायिक एवं औधोगिक इकाइयों से है, जिनका वस्तुओ एंव सेवाओ के निर्माण या प्रबन्ध संचालन एवं नियंन्त्रण अथवा दोनो राज्य के हाथो मे होता है।

भूमिका/ महत्व

  1. रोजगार के अवसर  
  2. निर्यात एकधिकार पर रोक  
  3. आत्मनिर्भरता का विकास 
  4. श्रेत्रीय अंसतुलन को कम करना। 
  5. राष्ट्रीय उत्पादन मे सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान  
  6. अचल पूंजी निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र का भाग-सार्वनिक क्षेत्र के विनियोग का बड़ा भाग आर्थिक आधारभूत संरचना- सड़क, रेल, उर्जा , सिंचार्इ क्षेत्र 
  7. सृदृढ़ औधोगिक आधार का निर्माण। 
  8. अर्थिक विकास की दर मे वृद्धि। 
  9. आर्थिक विकास के लिये धन का स्त्रोत 
  10.  समाजवादी समाज की स्थापना। 
  11. निजी क्षेत्र की बुराइयो को दूर करना।


सार्वजनिक क्षेत्रो की समस्याऐं -

अकुशल प्रबंध-  प्रबन्ध दूसरों से काम करवाने की कला। राजनीतिक हस्तक्षेप। कीमत नीति- सरकार लोक उपक्रमो की प्रशासनिक कीमतो मे वृद्धि करके लाभदायकता की सिथति मे लाना चाहती है। इससें उधोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओ एंव सेवाओ का मूल्य बढ़ जाता है सरकार कुशलता एवं उत्पादकता को बढ़ाकर कम करने का उपाय नही करती। क्षमता का कम उपयोग। सामग्री प्रबंध-इन उपक्रमो पर यह आरोप लगाया जाता है कि बहुत से सार्वजनिक उपक्रमो मे भारी मात्रा मे सामाग्री पायी जाती है, जिसे कारण इनकी लागते बढ़ जाती है तथा लाभ की सिथति कमजोर हो जाती है एवं दुर्लभ एवं न्यून कच्चे मालो का व्यर्थ प्रयोग करते है क्योकि इनके प्रयोग का आधार निशिचत नही होता है। आवश्यकता से अधिक मानव शकित -श्रम अधिकता मानव शकित आयोजन घटिया किस्म का है। बढ़ता हुआ घाटा-भारी घाटे वाले उधोगो मे राज्य बिजली बोर्डस एवं सिचार्इ परियोजनायें, सड़क परिवहन निगम और अन्य राज्य सरकारों के स्वामित्वाधीन उधम है।  परियोजनाओ मे अधिक समय लगना-प्रारमिभक अनुमान से ज्यादा समय लगना, जिससे निर्माण की लागत बढ़ जाती है। अति-पूंजीकरण- एक अध्ययन के अनुसार बहुत से सरकारी उधमो, जैसे हैवी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स एवं फर्टिलाइजर कार्पोरेशन आदि मे अधिक पूंजीकरण है। उसके मुख्य कारण है अपर्याप्त आयोजन, विनिर्माण के दौरान अनावश्यक विलम्ब, अतिरिक्त मशीनी क्षमता आयातित सामान खरीदना आदि। श्रम समस्या-अनुशासनाहीनता।  दोषपूर्ण नियंत्रण। अधिक पूंजी गहन तकनीक के कारण रोजगार का कम विस्तार।

भविष्य मे सार्वजनिक क्षेत्र के विकास के लिये प्राथमिकता क्षेत्र, निम्नलिखित होगे-

  1. अनिवार्य आधारभूत संरचना वस्तुये। 
  2. तेल एवं खनिज संसाधनो की खोज एवं विदोहन। 
  3. ऐसी वस्तुओं का निर्माण जिनमे सामरिक कारण तत्व प्रधान स्थान रखते है।
  4. ऐसे क्षेत्र जिनमे उच्च तकनीक की आवश्यकता हो जो दीर्घकालीन विकास के लिये महत्व रखते है तथा जिनमे निजी क्षेत्र द्वारा विनियोग अप्रर्याप्त है। 
उपरोक्त प्राथमिकताओ को ध्यान मे रखते हुये सरकार के निर्णय निम्नलिखित है :-
  1. सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तगर्गत निनियोग क्षेत्र की समीक्षा की जायगी ताकि सार्वनजिक क्षेत्र को आधारभूत संरचना हार्इटेक और सामरिक महत्व के उधोगो तक सीमित रखा जा सके।
  2. ऐसे सार्वजनिक उपाक्रम जो जीर्ण रूप से बीमार है और जिनका सक्षम बनाने की कोर्इ सम्भावना नही उन्हे पुनरूत्थान के लिये वितितय एवं पुर्ननिर्माण बोर्ड  को दिया जायेगा ।
  3. संसाधन गतिमान करने एवं सार्वजनिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र मे सरकारी हिस्सा पूंजी के एक भाग को जनता को बेचा जायेगा।
  4. सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को बार्डस को अधिक पेशेवर बनाया जायेगा और इ्रन्हे अधिक अधिकार दिये जायेगे।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो मे सुधार लाने के लिये एम ओ यू वी पद्धति द्वारा प्रबंधको को अधिक स्वायत्ता दी जायेगी औरा उन्हे अधिक दायित्वपूर्ण बनाया जायेगा।
  6. 1991 की नीति की घोषणा के बाद सरकार ने मार्च 2000 तक 66 सार्वजनिक उधमो को बीआर्इएफआर के निर्देश के लिये सौप दिया जिनमे से 27 इकाइयो के पुर्नरूत्थान पैकेज को स्वीकृति दी गयी।

सार्वजनिक क्षेत्र के उधमो के बारे मे सरकारी नीति के मुख्य अंश निम्न प्रकार है-

  • गैर सामरिक सार्वजनिक उपक्रमो सरकारी हिस्सा पूंजी का भाग कम करके 26 प्रतिशत या आवश्यक है तो इससे भी कम करना।
  • सक्षम होने योग्य सार्वजनिक उपक्रमो का पुनर्गठन करना।
  • जिन सार्वजनिक उपक्रमो को पुर्नउत्थान सम्भव नही उन्हे बन्द करना।
  • श्रमिको के हितो की पूर्ण सुरक्षा होनी चाहिये।


आपके सुझाव एवं प्रतिक्रिया कमेंट्स बॉक्स में आमंत्रित हैं।



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