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Sunday, 8 March 2015

Significance of Agriculture in Indian Economy

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व

(Significance of Agriculture in Indian Economy)


RPSC Junior Accountant and TRA Exam Economics Notes PDF

Dear RpscGuru experts readers today,s in this posts we are shearing RPSC Notes regarding to various level examinations in favor of Indian Economics.  In RPSC JR Accountant and TRA Exam their are asked 25 questions in Indian Economics parts. Read carefully all article here with posted in www.RpscGuru.in blogs and gate increase your score. 

भारतीय अर्थव्यवस्था मे कृषि की भूमिका अथवा महत्व -

     1. रोजगार-2001 की जनगणना के अनुसार 13.07 करोड़ कृषक, 8.48 करोड़ कृषि श्रमिक, 0.07 पशुपालको को मिलाकर देश की मुख्य कार्यशील जनसंख्या का 78.9 प्रतिशत कृषि एंव सम्बनिधत क्षेत्र मे इनकी संख्या 87.2 प्रतिशत है।
     2. राष्ट्रीय आय मे योगदान- प्रथम पंचवर्षीय योजना के समय कृषि का योगदान 56.46 प्रतिशत था जो घट रहा है और आज 17-18 प्रतिशत औसत रहा है।
     3. खाधान्नेा की पूर्ति -खाधानो का उत्पादन 244.78 मिलियन टन हो गया।
     4.विदेशी व्यापार मे योगदान-चाय, पटसन, सूती वस्त्र मे भारत के निर्यात का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। कृषि मे निर्यात का योगदान गिरता जा रहा है।
     5. राजस्व आय- कृषि राज्य सरकारों की आय का मुख्य स्त्रोत है। भू-राजस्व, कृषि आयकर, सिचांर्इ, वसूली कृषि आगतो पर कर आदि मदों से राज्य सरकारों को प्रतिवर्ष करोडो रूपयों की आय होती है।
     6. औधोगिक कच्चा माल - सूती वस्त्र उधोग, पटसन उधोग, चाय, काफी, रबर, नारियल, दाल चीनी, शराब आदि उधोगो के लिये कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है।
     7. सबसे बड़ा उपभोक्ता क्षेत्र- कपड़ा, उर्वरक, चीनी, वनस्पति, परिवहन दैनिक उपभोग की वस्तुयें कीटनाशक आदि जैसे कृषि का विकास हो रहा है वो मध्य वर्ग की ओर बढ रहा है तथा स्कूटर, मोटर सार्इकिल, भवनद निर्माण सामग्री आदि की तरफ भी बढ़ रहा है।
     8. अर्थव्यवस्था का आधार- प्रत्येक देश मे अर्थव्यवस्था की पांच सीढि़या होती है कृषि, उधोग, व्यापार, परिवहन एंव सामाजिक सेवा।
     9. पशुपालन एंव दुग्ध उत्पादन- विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक एवं सहायक व्यवसाय है तथा कृषि की अतिरिक्त आय एवं जीवन स्तर दोनो पशुपालन पर ही निर्भर है। दुग्ध की प्रति व्यकित उपलब्धता 124 ग्राम प्रतिदिन (1950-51) से 281 ग्राम (2010-11) प्रति दिन हो गया है।
     10.परिवहन विकास का आधार -भारत गांवो का देश है तथा ग्रामीण क्षेत्र का मुख्य आधार कृषि है कृषि उत्पादन के कारण ही देश मेंं सड़क एंव परिवहन का विकास हुआ है।
     11. राजनीतिक एवं सामाजिक महत्व -
     12. विश्व अर्थव्यवस्था मे स्थान -मूगंफली, दूध, चाय, अण्डा एंव मत्स्य उत्पादन मे प्रथम, गेहू, चावल मे द्वितिय, कपास एवं तम्बाकू मे तृतीय। सूखे मेवों का भण्डार है।

भारतीय कृषि की विशेषतायें -

1. प्रकृति पर निर्भर 2. जन भार। 3. जीवन निर्वाहक 4.निम्न उत्पादकता 5. भाग्यवादिता एंव रूढिवाद -मृत्यु जीवन सवामणी आदि पर अनावश्यक खर्च 6. कृषि जोतें छोटी है। 7. अभियांत्रिक अभाव 8. मिश्रित व्यवसाय 9. कृषि मे विविधता 10. खाधान्नो की प्रचुरता। 11. अदृश्य बेरोजगारी। 12. सिचांर्इ एंव पूजीं का आभाव। 13. फसलो एवं पूंजी का आभाव  14 अनुभव, परम्परा एवं परम्परागत खेती।

कृषि वित्त-

    क्रानित ने भी कृषि क्षेत्र मे वित्त आवश्यकता बढ़ाने का कार्य किया है। कृषि की नवीन व्यूहरचना मे खाद, बीज, कीटनाशक, सिचांर्इ, भण्डारण, परिवहन व्यवस्था कृषि यंत्रो की खरीद एवं अन्य कृषि आदाओ के लिये अल्पकालीन, मध्यकालीन एवं दीर्धकालीन वित्त की आवश्यकता की पूर्ति के लिये सहकारी संस्थाआें राष्ट्रीयकृत एंव व्यापारिक बैकों क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको एंव अन्य वितीय संस्थाओ के साथ-2 महाजन पर भी निर्भर रहना पड़ता है।

कृषि वित्त के प्रकार-

क) अवधि के आधार पर-

1. अल्पकालन साख (15 माह से कम) 2. मध्यकालीन साख (15 माह -5 वर्ष)  3. दीर्घकालीन साख (5 वर्ष से अधिक)

ख) उददेश्यो के आधार पर--

1. उत्पादक उददेश्य पर(फसल के समय) 2. अनुत्पादक उददेश्य (शादी, मृत्युभोज)

ग) जमानत के आधार पर

1. जमानत 2. गैर जमानत

घ) ऋणदाता के आधार पर

1.व्यकितगत  2.संस्थागत   

कृषि वित के स्त्रोत - गैर संस्थागत - संस्थागत - सरकारी विकास योजनायें।
गैर संस्थागत- देशी बैकर या साहूकार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है मुख्य रूप इसके होते है 1. जमींदार 2. कृषक महाजन 3. पेशेवर महाजन 4. व्यापारी 5. सम्बन्धीमित्र 6. आढ़तिये आते है। 1998 के बाद तो सरकार की किसान क्रेडिट कार्ड योजना के कारण किसान को सस्ता एवं सरलता से ऋण प्राप्त होने लगा है ऋण की अदायगी एवं बकाया की रसीद देना भी अनिवार्य कर दिया। वर्तमान मे कुल ऋणाें मे परम्परागत ऋणो की भूमिका 14 से भी कम हो गयी है तथा देशी साहूकारों का योगदान भी घटकर 10 प्रतिशत से नीचे आ गया है।
संस्थागत स्त्रोत- 1. सहकारी संस्थायें -जो तीन रूप से है।
प्राथमिक कृषि साख समितियां - ग्राम स्तर पर अपने अंशधारियो को ऋण प्रदान करती हे इनकी ब्याज दर 10 प्रतिशत से 12 प्रतिशत होती है। इनकी अवधि एक वर्ष के लिये उत्पादन कार्यो पर देती है।
जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक- (केनिद्रय सहकारी बैंक) इन बैको का निर्माण जिला स्तर पर प्राथमिक साख समितियोव्यकितयों एवं ऋण समितियों की सदस्यता से होता है।
राज्य सहकारी बैंक- योजनाकाल मे केन्द्रीय बैंको के पुन: संगठन के कारण इनकी संख्या 505 से घटकर 367 ही रह गर्इ है।
1.  राज्य सहाकरी बैक - यह सहकारी साख समितियों का शीर्षस्थ बैंक होता है केन्दी्रय बंैक ही इसके सदस्य होते है इनकी संख्या बढ़ाकर 29 हो गर्इ है। कुल शाखायें 823 है। अल्पकालिन ऋणों के लिये।
2. भूमि विकास बैक - सहकारी संगठनो की साख मात्रा बढ़ने के बावजूद अकुशल प्रबन्ध व्यवस्था अदक्ष सेवा वर्ग, सदस्यो मे काम के प्रति समर्पण, निष्ठा का अभाव बडे़ किसानों का प्रभुत्व तथा दोषपूर्ण सहकारिता अधिनियम आदि के कारण सहकारी साख संगठन सही अर्थ मे कृषि साख का स्तम्भ बन सका। मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन ऋणों के लिए।
3.क्षेत्रीय ग्रामीण बैंंक- 1956 से ही स्टेट बैक आफ र्इण्डीया के राष्ट्रीयकरण के साथ ही सार्वजनिक बैंको का राष्ट्रीयकरण होने के बावजूद भी प्राथमिकता वाले क्षेत्रो मे अपेक्षित साख को पूर्ति के अभाव मे 1975 मे पांच क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की स्थापना की गयी जिनकी संख्या वर्तमान मे 196 है। सितम्बर 2005 में इनके एकीकारण की प्रकिया चालू हो जाने से इनकी संख्या 2006-07 मे घटकर 9 रह गयी तथा 20 से 50 गांवो तक एक शाखा कार्यरत है। ग्रामीण बैको की सिथति को ठीक करने के लिये दातावाला समिति गठित की गर्इ है।
4. राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक - 12 जूलार्इ 1982 को नाबार्ड की स्थापना की गयी तथा रिजर्व बैक के कृषिगत साख विभाग तथा कृषि पुनर्वित एंव विकास निगम के सभी कार्यो को इसे सौंप दिया गया। इसकी प्रदत एवं चुकता पूंजी क्रमश:100 करोड़ एवं 500 करोड़ रूपये थी इसमे भारत सरकार एवं रिजर्व बैंक आफ इणिडया के बराबर की भागीदारी है। यह सहकारी बैंको का बैंक हैं।
5. वाणिज्यक बैंक- व्यापारिक बैको के राष्ट्रीयकरण के पूर्व व्यापारिक बैंक केवल अप्रत्यक्ष ऋणो की पूर्ति करते थें किन्तु राष्ट्रीयकरण के पश्चात कृषि साख मे महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करने का दायित्व सम्भाला, जिसे बैंक ने पूरा भी किया।
6. रिजर्व बैंक आफ इणिडया - प्रत्यक्ष रूप से की गर्इ भूमिका नही है। 1935 में वितीय सहायता करने का उतरदायित्व सौपा और 1982 मे नाबार्ड को दायित्व सौपा गया और ग्रामीण विकास एवं वित विभाग निरीक्षण एवं कार्ययोजना बनाने का कार्य भी करता है।
7. एस.बी.आर्इ. - यह कृषि वित मे सहयोग कर रहा है।

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Last Update: 10 July 2016

1 comment:

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